गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

तस्वीर मेरी साफ़ है पर जाने क्यूँ शिकायत रहती हैं लोगो को |
जाने क्यूँ कीमत मेरी एहसास नहीं होती इस खुदगर्ज जमाने को |
सब रंग चढ़े पत्थर को ही दिल समझ लेते है |
पर मेरे आंसुओ को भी लोग दगा कह देते हैं ||
तकलीफ बस यही है मुझ दिल की
की मैं टूट जाता हूँ किसी के लिए
और लोग मुझे टूटा हुआ कह देते हैं |

अलविदा
अमरेंद्र

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

दुखद....आंसू आ गए देख के... क्या इंसान स्वयं के जान को ही जिंदगी समझता है ...दिमाग हो न हो पर दिल तो हर जीवो में होता हैं  जो ईस्वर का ठिकाना होता है उसे रुलाकर हम कौन सी ख़ुशी पाएंगे क़यामत इसीलिये फिर किसी पर रहम नहीं करती |

कितने कलेजे चीर देते हैं आसानी से हंसकर |
इंसान तेरी फितरत भी शैतान से काम नहीं ||